अनशन के अस्त्र से सरकारों को हिलाया और सत्ता को झुकाया

Date: 2026-07-27
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अनशन के अस्त्र से सरकारों को हिलाया और सत्ता को झुकाया

बिलासपुर, 20 जुलाई 2026 | भारत के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आजादी के बाद के आंदोलनों तक, अनशन (हunger strike) हमेशा से शक्तिशाली हथियार साबित हुआ है। सत्याग्रह की इस परंपरा ने न केवल सरकारों को हिलाया बल्कि सत्ता को झुकने पर मजबूर भी किया। हाल ही में नई दिल्ली के जंतर मंतर पर एक किसान नेता सोमन के पिता द्वारा अनशन पर बैठने की घटना ने फिर से इस हथियार की याद दिलाई। दिल्ली पुलिस द्वारा उन्हें उठाकर सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, लेकिन अनशन की इस परंपरा ने एक बार फिर देश की चेतना को झकझोर दिया।

महात्मा गांधी ने 1932 में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ यरवदा जेल में 26 दिन तक अनशन किया, जिससे ब्रिटिश नीतियों पर असर पड़ा। 1918 में अहमदाबाद मिल हड़ताल के दौरान गांधीजी ने मजदूरों की मांगों के समर्थन में अनशन किया। 1947-48 में महात्मा गांधी ने कलकत्ता दंगों को रोकने के लिए अनशन किया, जिससे शांति बहाल हुई। 1952 में पोटी श्रीरामुलु के 56 दिन के अनशन ने आंध्र प्रदेश राज्य के गठन की मांग पूरी कराई।

स्वतंत्र भारत में भी यह परंपरा जारी रही। 2006 में ममता बनर्जी ने सिंगुर में नंदीग्राम आंदोलन के दौरान अनशन किया। 2011 में अन्ना हजारे ने लोकपाल बिल की मांग को लेकर 12 दिन का अनशन किया, जिसने पूरे देश को हिला दिया। हाल के वर्षों में किसान आंदोलनों, श्रमिकों की मांगों और विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर नेता और कार्यकर्ता अनशन का सहारा लेते रहे हैं।

इंदिरा गांधी के समय में भी विपक्षी नेताओं ने अनशन किए। सोमन के पिता ने 1984 में लालबहादुर शास्त्री के समर्थन में अनशन किया था। इतिहास गवाह है कि अनशन ने न केवल सरकारों को झुकाया बल्कि जनता की आवाज को बुलंद किया। हालांकि, लंबे अनशन से स्वास्थ्य जोखिम भी बढ़ जाता है।

आज भी लोकतंत्र में यह अहिंसक हथियार मजबूत है। सरकारों को चाहिए कि जनता की मांगों को गंभीरता से सुना जाए, ताकि अनशन जैसे कदम न उठाने पड़ें।


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