जिंदा न्यूरॉन्स और इलेक्ट्रॉनिक्स के मेल से बना ‘ब्रेन’, भारतीय मूल के वैज्ञानिक की बड़ी खोज
वॉशिंगटन |
वॉशिंगटन: आने वाले समय में मशीनें भी जीवित मस्तिष्क के साथ मिलकर सोचेंगी और सीखेंगी। आईआईटी खड़गपुर से बीटेक और अमेरिकी प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रिकल कंप्यूटर इंजीनियरिंग व न्यूरोसाइंस में दोहरी पीएचडी कर चुके भारतीय मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. कुमार मृत्युंजय ने एक क्रांतिकारी 3डी बायो-इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम तैयार किया है। यह सिस्टम जिंदा न्यूरॉन्स और इलेक्ट्रॉनिक्स को जोड़कर बनाया गया ‘मिनी ब्रेन’ है।
सपाट चिप से आगे, दिमाग जैसी बनावट
अब तक 'ब्रेन-ऑन-ए-चिप' तकनीक सपाट सतह तक सीमित थी, जिससे न्यूरॉन्स का विकास एक दिशा में ही हो पाता था। डॉ. कुमार की नई 3डी प्रणाली ने यह सीमा तोड़ दी है। इस मिनी 3डी चिप में न्यूरॉन्स को हर दिशा में बढ़ने की स्वतंत्रता है, ठीक वैसे ही जैसे मानव मस्तिष्क में स्वाभाविक रूप से विकसित होते हैं। चिप में लगे सूक्ष्म सेंसर न सिर्फ न्यूरॉन्स के विद्युत संकेतों को पढ़ते हैं, बल्कि जरूरत पड़ने पर उन्हें सक्रिय भी कर सकते हैं। यानी इलेक्ट्रॉनिक्स और जीवित न्यूरॉन्स के बीच दो-तरफा संवाद संभव है।
एआई से अलग, असली सीखने की क्षमता
डॉ. कुमार के अनुसार, अब तक का एआई सिर्फ डिजिटल एल्गोरिदम पर आधारित था। लेकिन यह नई प्रणाली वास्तविक जीवित न्यूरॉन्स के जरिए सीखने की क्षमता विकसित कर सकती है। मशीन को बार-बार डेटा फीड करने की जरूरत नहीं होगी, वह खुद अनुभव से सीखेगी।
बीमारियों के इलाज में मददगार
इस खोज से अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के अध्ययन को नई गति मिलेगी। वैज्ञानिक अब लैब में ही मानव मस्तिष्क के मॉडल पर दवाओं का परीक्षण कर सकेंगे। साथ ही यह तकनीक भविष्य के प्रोस्थेटिक्स यानी कृत्रिम अंगों और ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस को भी अधिक उन्नत बना देगी। लकवाग्रस्त मरीज सिर्फ सोचकर रोबोटिक हाथ-पैर चला सकेंगे।
डॉ. कुमार का यह आविष्कार बायोलॉजी और इंजीनियरिंग के संगम का बेहतरीन उदाहरण है। यह तकनीक आने वाले दशक में मेडिसिन और एआई दोनों क्षेत्रों की दिशा बदल सकती है|