हर साल हम 1.2 लाख शब्द कम बोल रहे... टेक्नोलॉजी ने छीनी इंसानियत की पहचान
बिलासपुर, 30 अप्रैल 2026: आधुनिक जीवनशैली और स्मार्टफोन की लत ने मानव संवाद को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। एक नए अध्ययन के अनुसार, औसत व्यक्ति हर साल लगभग 1.2 लाख शब्द कम बोल रहा है। यानी रोजाना बोले जाने वाले शब्दों की संख्या में 28% की भारी कमी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कमी सिर्फ शब्दों की नहीं, बल्कि इंसानी रिश्तों और भावनात्मक जुड़ाव की भी है।
दैनिक भाषा में आई इस गिरावट का मुख्य कारण स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स हैं। जहां पहले लोग पड़ोसियों, दुकानदारों या सफर के साथियों से खुलकर बात करते थे, वहीं आज हेडफोन लगाए, स्क्रीन पर आंखें गड़ाए हर कोई अपने डिजिटल संसार में खोया रहता है। इमोजी और छोटे-छोटे मैसेज ने पूरी बातचीत को संक्षिप्त कर दिया है। “जब दो लोग आमने-सामने बैठकर बात करते थे तो भाव, हाव-भाव और स्वर सभी शामिल होते थे, लेकिन अब सिर्फ ‘👍’ या ‘😂’ से काम चल जाता है,” कहते हैं भाषा विशेषज्ञ प्रो. रजनीश शर्मा।
यह बदलाव मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डाल रहा है। अकेलेपन की भावना बढ़ रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, अकेलापन अब धूम्रपान और मोटापे जितना खतरनाक है। जब हम किसी अजनबी से दो मिनट की साधारण बात भी कर लेते हैं तो ऑक्सीटोसिन हार्मोन रिलीज होता है, जो खुशी और सुरक्षा की अनुभूति कराता है।
शिक्षाविदों का सुझाव है कि हर दिन कम से कम एक अजनबी से बात करने की आदत डालें—चाहे वह किराना दुकान पर हो, बस में हो या पार्क में। छोटी-छोटी बातें जैसे मौसम, ट्रैफिक या कोई सकारात्मक खबर, रिश्तों की नींव रख सकती हैं।
टेक्नोलॉजी ने हमें सुविधा दी है, लेकिन इंसानियत की असली पहचान तो संवाद में छिपी है। अगर हम अभी नहीं संभले तो आने वाली पीढ़ी शब्दों की कमी से जूझती नजर आएगी। आज ही किसी अजनबी से मुस्कुराते हुए बात शुरू कीजिए—दुनिया तुरंत बेहतर लगने लगेगी।