पेरेंटिंग: 10 साल का बेटा पैसे की कीमत नहीं समझता, दोस्तों को देखकर महंगे कपड़े-खिलौने मांगता है, उसे पैसे की वैल्यू कैसे सिखाएं?
इंदौर/नई दिल्ली। आजकल कई माता-पिता इस समस्या से जूझ रहे हैं कि उनका 10 साल का बच्चा दोस्तों को देखकर महंगे कपड़े, खिलौने और गैजेट्स की जिद करता है। वह पैसे की असली कीमत नहीं समझ पाता और हर इच्छा तुरंत पूरी करने की मांग करता है। पेरेंटिंग सीरीज में विशेषज्ञों का मानना है कि यह उम्र बच्चों को फाइनेंशियल लिटरेसी सिखाने का सही समय है।
10 साल के बच्चे की रोजमर्रा की जिंदगी माता-पिता ही संभालते हैं। स्कूल का टिफिन घर से जाता है, आने-जाने का खर्च भी वे उठाते हैं। ऐसे में पॉकेट मनी की प्रैक्टिकल जरूरत नहीं होती, लेकिन दोस्तों के पास पैसे देखकर तुलना होना स्वाभाविक है। इससे बच्चे में दिखावा और फिजूलखर्ची की आदत पड़ सकती है।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि सबसे पहले बच्चे को जरूरत और चाहत का फर्क समझाएं। बताएं कि पैसे मेहनत से कमाए जाते हैं और हर चीज की सीमा होती है। छोटी-छोटी आदतों से शुरुआत करें:
पुरानी चीजों को बर्बाद न करने दें (पेंसिल, किताबें, खिलौने)।
नई चीज खरीदने से पहले पुरानी पूरी तरह इस्तेमाल करने की आदत डालें।
परिवार की आर्थिक स्थिति उम्र के अनुसार समझाएं।
पैसे कमाने के लिए मेहनत की जरूरत पर चर्चा करें।
पॉकेट मनी देते समय नियम बनाएं। छोटी राशि दें और खर्च का हिसाब मांगें। इससे बच्चे में जिम्मेदारी और बचत की आदत विकसित होगी। अगर बच्चा महंगे खिलौने की जिद करे तो वैकल्पिक सस्ता विकल्प दें या 24 घंटे इंतजार का नियम अपनाएं। सच्ची खुशी महंगी चीजों में नहीं, बल्कि परिवार के साथ समय बिताने में होती है।
माता-पिता की भूमिका महत्वपूर्ण है। बच्चे को चीजें खरीदकर न लाड़-प्यार करें, बल्कि मेहनत का महत्व सिखाएं। छोटी जिम्मेदारियां दें जैसे कमरा साफ करना या छोटे काम। इससे वे समझेंगे कि पैसे बिना मेहनत के नहीं मिलते।
निष्कर्ष: 10 साल की उम्र में पॉकेट मनी से ज्यादा जरूरी है पैसे की वैल्यू सिखाना। इससे बच्चा भविष्य में वित्तीय रूप से जिम्मेदार और समझदार बनेगा। माता-पिता को धैर्य रखकर लगातार मार्गदर्शन करना चाहिए।