नई दिल्ली/बिलासपुर, 25 मार्च 2026 (दैनिक भास्कर संवाददाता)। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में साफ कहा है कि धर्म बदलने पर अनुसूचित जाति (एससी) का दर्जा और आरक्षण दोनों खत्म हो जाते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायी ही एससी का लाभ ले सकते हैं। ईसाई, इस्लाम या किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करने वाले व्यक्ति को एससी का दर्जा नहीं मिलेगा और न ही एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत सुरक्षा।
कोर्ट की दो-टूक टिप्पणियां:
• संवैधानिक आदेश 1950 के क्लॉज-3 में साफ लिखा है— हिंदू, सिख या बौद्ध ही अनुसूचित जाति की श्रेणी में आते हैं। अन्य धर्म अपनाने पर जन्म के आधार पर भी एससी दर्जा नहीं रहता।
• धर्मांतरण के क्षण से ही एससी स्टेटस तुरंत और पूरी तरह समाप्त हो जाता है। कोई अपवाद नहीं।
• ऐसे मामलों में केस सामान्य धाराओं में ही दर्ज होगा, एससी/एसटी एक्ट लागू नहीं होगा।
• अगर कोई व्यक्ति मूल धर्म (हिंदू/सिख/बौद्ध) छोड़कर दूसरा धर्म अपनाता है, तो उसे सामाजिक-धार्मिक रूप से नए समुदाय की स्वीकृति लेनी होगी, लेकिन पुराना एससी दर्जा वापस नहीं मिलेगा।
क्या था पूरा मामला?
यह फैसला आंध्र प्रदेश के एक मामले पर आया। आंद्र प्रदेश हाईकोर्ट ने पहले ही कहा था कि पादरी चिंबाडा आनंद (जो मूल रूप से अनुसूचित जाति से था) ईसाई धर्म अपनाने के बाद एससी दर्जा नहीं रख सकता। उसने प्रार्थना सभा में मारपीट की घटना में एससी/एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज कराया था, लेकिन हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए पादरी की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा—
“ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं है। ईसाई बनने वाला व्यक्ति सामाजिक रूप से उस समुदाय से बाहर हो जाता है, इसलिए एससी का दर्जा समाप्त माना जाएगा।”
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य बिंदु:
• कानूनी सुरक्षा: एससी/एसटी एक्ट का लाभ केवल उन व्यक्तियों को मिलेगा जो हिंदू, सिख या बौद्ध हैं।
• सरकारी आदेश: 1950 का संवैधानिक आदेश अभी भी लागू है। राष्ट्रपति द्वारा जारी कोई पुराना आदेश भी इस पर बदलाव नहीं कर सकता।
• दोहरी पहचान असंभव: कोई व्यक्ति एक साथ ईसाई होकर भी एससी का दावा नहीं कर सकता। यह संविधान के साथ धोखा होगा।
• एसटी पर अलग नियम: अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा धर्म पर नहीं, बल्कि रीति-रिवाज, सामाजिक संगठन और समुदाय की स्वीकृति पर निर्भर करता है।
क्या प्रभाव पड़ेगा?
यह फैसला उन लाखों लोगों पर असर डालेगा जो दलित समुदाय से ईसाई या इस्लाम में धर्मांतरण कर चुके हैं और अभी भी आरक्षण, सरकारी नौकरियों या अन्य लाभ ले रहे थे। अब ऐसे व्यक्तियों को एससी प्रमाण-पत्र नहीं मिलेगा और पुराने लाभ भी समाप्त हो सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि आरक्षण का लाभ लेने के लिए धर्म बदलना संविधान से धोखा है। यह फैसला संवैधानिक प्रावधानों की सख्त व्याख्या करता है और भविष्य में ऐसे विवादों पर स्पष्ट दिशा-निर्देश देता है।